प्रेमचंद को पढ़ते हुए अक्सर मैं भूल जाता हूँ, कि कोई सौ वर्ष पहले लिखी बात पढ़ रहा हूँ। हर मर्तबा जब आपको पढ़ने को किताब खोलता हूं तो लगता है कि गाँव के किसी अधेड़ ने अपने सिर से बरसीम का एक गट्ठर उतारने को बुलाया है, जो बस अभी, खेत से ही चला आ रहा है। और फिर कहता हो, "कहाँ रहे?.... बैठो, एक बात बताऊँ।" मुंशीजी ने सैकड़ों किस्से सुनाए। ‘ईदगाह’ न उनमें पहला है, न आख़िरी। फिर भी अगर मैं आज उसकी चर्चा करने बैठा हूँ, तो संभव कारण यह है कि कहानियों की दुनिया में क़दम रखने पर सबसे