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ईदगाह : चिमटे से आगे

Updated: Jun 18



 

प्रेमचंद को पढ़ते हुए अक्सर मैं भूल जाता हूँ, कि कोई सौ वर्ष पहले लिखी बात पढ़ रहा हूँ। हर मर्तबा जब आपको पढ़ने को किताब खोलता हूं तो लगता है कि गाँव के किसी अधेड़ ने अपने सिर से बरसीम का एक गट्ठर उतारने को बुलाया है, जो बस अभी, खेत से ही चला आ रहा है। और फिर कहता हो, "कहाँ रहे?.... बैठो, एक बात बताऊँ।" 

मुंशीजी ने सैकड़ों किस्से सुनाए। ‘ईदगाह’ न उनमें पहला है, न आख़िरी। फिर भी अगर मैं आज उसकी चर्चा करने बैठा हूँ, तो संभव कारण यह है कि कहानियों की दुनिया में क़दम रखने पर सबसे पहले जिन पात्रों ने मेरा हाथ पकड़ा था, मेरी हां में हां मिलाई थी, उनमें हामिद भी था। 

अवधी में कुछ पंक्तियाँ हैं— 

कइसे हाल कही बिगड़े दिनकै, 

कि करात केहू कै निबोली पिया। 

जब पास अधेला रहै न कबौ,  

तब ईद सोहाय न होली पिया। 


 

ईद है,  

पर ईद का चाँद सबके लिए एक-सा नहीं निकलता। किसी के लिए यह मेले,मिठाइयों और खिलौनों के साथ आया है, और किसी के लिए चिंताओं की गठरी लेकर। बूढ़ी अमीना के लिए यह ईद निगोड़ी है। उसके पास पाँच पैसे हैं, और यही उसकी पूरी ईद है। चार-पाँच साल का हामिद - अमीना का पोता, कि जैसे आशा और प्रकाश का सागर है। उसके पास तीन कोस दूर ईदगाह जाने के लिए जूते नहीं हैं और जेब में बस तीन पैसे हैं, पर उसकी ईद तीन पैसों से कहीं बड़ी है। हामिद को देख कर लगता है, जीवन की लौ का ईंधन सच नहीं, आशा है—चाहे वह झूठ से ही क्यों न आए। झूठ इसलिए, क्योंकि अमीना ने उसे बताया है कि उसके माता - पिता ढेरों नेमतों और पैसों के साथ लौटेंगे लेकिन असल में वे दोनों कभी नहीं लौटने वाले। 

घर में सेवइयाँ नहीं हैं। माँगकर बनेंगी, और उसमें भी हिस्सा लगेगा धोबिन, नाइन, मेहतरानी और चूड़ीहारिन का। 

हाँ, हिस्सा। इस हाल में भी। 

मुझे भी पहली नज़र में यह सिर्फ अमीना की भलमनसाहत लगी थी, और मैं अभी भी इसे गलत नहीं कहता। बस, इससे इज़ाफ़ी मेरी नज़र में दो और संभावित कारण हैं।। 

 

पहला—’स्वाभिमान और प्रतिष्ठा’। मैंने पढ़ा है कि अमीना के हिसाब से वह गरीब है, पर इतनी भी नहीं कि साल में एक बार आई ईद पर लोगों से मुँह चुराए।  


और दूसरा कारण है -- यह तथ्य, कि मनुष्य अभाव में भी सामाजिक प्राणी बना रहता है।  

मुझे इस बात की जड़ें हमारी परंपराओं और इतिहास तक जाती दिखाई देती हैं। हरारी अपनी पुस्तक ‘Sapiens: A Brief History of Humankind’ में कहते हैं कि ‘मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति बड़ी संख्या में सहयोग करने की क्षमता है।’ बिना दूसरों की परवाह करने का गुण विकसित किए वह एक सफल प्रजाति नहीं बन सकता था। 

ध्यान रहे, हम यहाँ ' सहयोग ' की चर्चा कर रहे हैं, 'दान ' की नहीं। अमीना ने दान नहीं दिया। दान ऊर्ध्वाधर होता है—देने वाला बड़ा और लेने वाला छोटा। यहाँ ऐसा कुछ नहीं है। 

मुझे लगता है कि मेरी और आपकी पहचान के बारे में बात करते वक्त हमारी परंपराएँ भी 'मैं' और 'तुम' से कहीं ज़्यादा 'हम' का ज़िक्र करती हैं। उदाहरण के नाम पर मुझे बहुत कुछ याद आता है। विक्टर फ्रैंकल अपनी किताब ‘Man's Search for Meaning’ में बताते हैं कि नाज़ी यातना शिविरों में लोग अपनी आख़िरी रोटी भी बाँट देते थे। 


 

कबीर तो सीधे लिखते हैं— 

"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाए। 

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए॥

 

हामिद बाकी साथी लड़कों--महमूद, मोहसिन, नूरे, सम्मी--और गाँववालों के साथ ईदगाह पहुँचता है। रास्ते भर में बच्चों की इस अदालत ने कॉलेज, क्लबघर, अपनी माताओं, शहर की मेमों, जिन्नातों और पुलिस की प्रतिष्ठा जैसे मुद्दों पर सैकड़ो फैसले सुनाए हैं। 


ईदगाह में लाखों सिर एक साथ झुकते और उठते हैं। वजू करने वालों की इन पंक्तियों को देखकर मैं और आप उनकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति नहीं बता सकते। हां मैं भी इस बात को मानता हूं कि ईश्वर के सामने सब बराबर हैं, और साथ ही मानता हूं कि ऐसे हुजूम इस बात की बार बार तस्दीक करते हैं। 

इसके बाद इस बाल-मंडली का असल ईदगाह आता है--झूले, मिठाई और खिलौनों की दुकानें। मोहसिन, नूरे, सम्मी और महमूद--सभी लड़के चक्कर का मज़ा लेते हैं, मिठाई खाते हैं और खिलौने खरीदते हैं। हामिद कुछ नहीं लेता। 

कुछ और आगे बढ़ने पर दिखती है लोहे की दुकान, और उसमें रखा चिमटा। 

ठहरिए। 

 

यही कहानी का वह हिस्सा है जहाँ मैं सबसे देर रुका था।  

मेरे पास दो प्रश्न हैं। 

पहला -- हामिद के पास झूले, खिलौने और मिठाई छोड़ते वक्त चिमटे का ख़याल था क्या? अगर नहीं, तो जरा सोचिए कि वह बिना किसी कारण के ख़ुद को क्या कहकर रोकता होगा? 

दूसरा, और मेरा मुख्य सवाल—अगर चिमटा न मिलता तो? 

 

पहली बात पर आता हूँ। 


हमें सदा से सिखाया गया है—पहले लक्ष्य तय करो, फिर त्याग करो। पर जीवन अक्सर इससे उलट चलता है। (कम-से-कम अभी तक मेरे साथ तो ऐसा रहा है।)पहले त्याग करना होता है और लक्ष्य बाद में दिखाई पड़ता है।

 

मिठाइयों को बीमारियों का घर और खिलौनों को माटी बताते वक्त हामिद के पास विकल्प में कोई महान लक्ष्य नहीं था। यक़ीन मानिए, उस वक्त तो चिमटे की सूरत भी उसके दिमाग़ में नहीं होगी। अगर मुझे उसके मन में कुछ चलता दिखाई देता है, तो वह है—"मेरे पास सिर्फ़ तीन पैसे हैं।","अच्छा है.... लेकिन इतना अच्छा भी नहीं।", "अभी मेला ख़त्म नहीं हुआ, देखता हूँ.. आगे क्या है।"  


ध्यान दीजिए, बच्चों का एक लाक्षणिक गुण है कि वे उसी क्षण के सुख का चुनाव करते हैं, लेकिन हामिद नहीं करता। क्यों? 

क्योंकि वह इस मामले में शायद बूढ़ा हो चुका है, और यहीं से मुझे उसके बूढ़े होने की सबसे पहली ख़बर मिलती है। ये बूढ़ापन एक भूमिका है, और इसी बूढ़ेपन की बात कहानी अपनी आख़िरी पंक्तियों में करती है। 

 

आता हूँ दूसरी बात पर। 


असल जीवन में हामिद को चिमटा मिलता भी है! कि वह चिमटे की दुकान के सामने से निकलता ही नहीं है कभी? यह प्रश्न मुझे मानो मूल कहानी से भी बड़ा मालूम पड़ता है। 

मुझे दिख रहा है कि चिमटा कहानी का सौभाग्य है। असल ज़िंदगी इतनी रोचक नहीं। ज्यादातर हामिद मिठाइयों, झूलों और खिलौनों को ठुकरा कर भी खाली पेट और मुट्ठी में तीन पैसे भींचे घर लौटते हैं। महमूद उन्हें केले नहीं देता और न अमीना उन्हें गले लगाकर रोती है। 

और यहाँ से मिलने वाले आत्मसंदेह से फिर दो घटनाएँ हो सकती हैं। या तो वह अगली बार मिठाई खा लेगा, या वह अभी भी हामिद बना रहेगा। और मुझे लगता है, जो बात हमें उस समय भी हामिद बनाए रखती है, वह गीता  की इस पंक्ति से भिन्न नहीं— 


"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"

 

यहां ईदगाह मुझे एक सुंदर बात बताती है। 

हामिद का चरित्र चिमटा खरीदने से नहीं बना। उसका चरित्र तब बन चुका था, जब उसने पहली मिठाई छोड़ी थी, पहला झूला और खिलौना छोड़ा था। 


यानी निर्णय का असल मूल्य उसके परिणाम से नहीं, निर्णय की परिस्थितियों और उद्देश्य से तय होता है। हमारी न्यायव्यवस्था भी आत्मरक्षा और हत्या में स्पष्ट अंतर करती है। 

 

सौभाग्यवश ही सही, हामिद को लोहे की दुकान भी दिखती है और चिमटा भी। उसे दादी के जले हाथ याद हैं और वह अम्मा व पड़ोसिनों की दुआओं को सीधे अल्लाह के दरबार जाता समझकर फ़ैसला करता है कि तीन पैसे का इससे अच्छा उपयोग क्या हो सकता है। 

पूरे तीन पैसे चुकाकर चिमटा ले लिया जाता है। 

 

हामिद भूखा है, उसके साथी उसे चिढ़ा रहे हैं, फिर भी उसे दादी का जला हाथ नहीं भूलता। दुआएँ खिलौनों से बड़ी दिखाई पड़ती हैं। यह व्यवहार कितना असामान्य है, इसको छोड़कर अभी आप बताइए कि आपके मुताबिक हामिद ऐसा है क्यों? 

गरीबी? 

पहली नज़र में मुझे भी यह उत्तर सटीक और पूरा दिखाई दिया था।यानी इतनी-सी ही तो बात है कि ‘कष्ट मनुष्य को बेहतर बनाता है’, बस ! 

क्यों न लगता। 

दिनकर नें ‘रश्मिरथी’  में मानो इसी बात का तो समर्थन किया है, कि— 


"विपदाएँ दूध पिलाती हैं, लोरी आँधियाँ सुनाती हैं, 

जो लाक्षागृह में जलते हैं, वे ही शूरमा निकलते हैं।"

 

लेकिन, मेरा फिर एक सवाल है। कफ़न  के 'घीसू और माधव' जतन से जुटाए पाँच रुपये का कफ़न क्यों नहीं लेते? दावत क्यों उड़ा देते हैं? 


चलिए, आगे के लिए इन दो किरदारों को भी पास बिठा लेते हैं। 

हाँ, अब हामिद के साथ-साथ इन्हें भी देखिए। क्या अभी भी आपको लगता है कि गरीबी सीधे-सीधे तय करती है कि व्यक्ति के नैतिक मूल्य क्या होंगे?

 

कितने ही बच्चे गरीबी में बड़े होते हैं, कितनी ही माताओं के हाथ जलते हैं, फिर भी ..हर बच्चा हामिद नहीं बनता।फिर हामिद को हामिद बनाता क्या है? 

मुझे लगता है कि इसमें सबसे ज़्यादा हाथ ‘अमीना के उदाहरण’ का है। हामिद प्रेम पा रहा है। वह गरीब है, पर उपेक्षित नहीं। अभाव और उपेक्षा एक चीज़ नहीं हैं। उसकी दुनिया में कम-से-कम एक व्यक्ति है जो उससे प्रेम करता है। प्रेम सार्थक है, त्याग का अर्थ है। 


घीसू से पूछिए। उसकी दुनिया में प्रेम कहाँ है? विश्वास कहाँ है? त्याग का उदाहरण कहाँ है? इसीलिए मुझे घीसू और माधव को सिर्फ आलसी कह देना बड़ी हल्की बात लगती है। मैं देखता हूँ, मानो उन्होंने जीवन से एक भयानक निष्कर्ष निकाल लिया हो कि 'अगर हर दुःख को गंभीरता से लोगे, तो जी नहीं पाओगे।'  उनकी संवेदना की जैसे मृत्यु हो गई है। 

 

चलिए, मैं आपको घीसू और हामिद के इस अंतर से और आगे ले चलता हूँ। 

इसी खरीद-फरोख्त के बीच हामिद सोचता है—"...एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ किस तरह सलूक किया जाता है।..."  वह यह नहीं सोचता कि वह खाएगा और बाकियों को तरसाएगा। 


मैं भी, हमारे और आपके जैसे इसी हाड़-मांस से बने व्यक्तियों को जानता हूँ, जिनकी कल्पना में भी जब संपत्ति आती है, तो वह बाँटने के रूप में आती है। 

मैं मानता हूँ कि इसे चारित्रिक महानता कह देना रहस्य को नाम देकर छोड़ने जैसा है। मानव स्वभाव है कि जो भाव हमें सबसे गहराई से मिलता है, हम वही आगे बाँटते हैं। और हामिद के लिए यह भाव अमीना का त्याग ही है। और इन्हीं अर्थों में मुझे लगता है कि चिमटा खरीदने का निर्णय मेले में हुआ था, पर इसकी तैयारी सालों से अमीना के घर में चल रही थी। 

 

लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि मनुष्य अगर बिल्कुल वही लौटाता जो उसे मिला है, तो संसार कहीं अधिक सरल होता? हर अपमानित व्यक्ति अपमान लौटाता और हर प्रेम पाया हुआ व्यक्ति प्रेम। पर ऐसा है नहीं। 

और इसीलिए मुझे लगता है कि मैंने मानव स्वभाव के बारे में बस अभी जो बात कही थी वह थोड़ी अधूरी है। मेरे विचार से ‘आप और मैं केवल अनुभवों का गठ्ठर नहीं हैं, हम उन अनुभवों के अर्थ भी गढ़ते हैं।’ 

यहीं से ईदगाह हमें एक सीढ़ी और गहरा उतारती है। हमें एक और ज़रूरी बात दिखती है—'व्यक्ति उस भाव का क्या अर्थ निकालता है जो उसे मिल रहा है।' 


देखिए, हामिद का अपनी परिस्थिति और अमीना के स्वभाव को लेकर निष्कर्ष यह नहीं है कि "मैं गरीब हूँ।" उसका निष्कर्ष है—"अम्मा मेरे लिए इतना करती हैं।" 

यही बात ‘Man's Search for Meaning’ की यह पंक्तियाँ भी कहती हैं— 


"Everything can be taken from a man but one thing: the last of the human freedoms—to choose one's attitude in any circumstances, to choose one's own way." 

 

हामिद चिमटा लेकर बाकियों के साथ वापस घर चलता है। खिलौनों का सिक्का जमाने के लिए बच्चों के बीच ख़ासा शास्त्रार्थ होता है, पर हामिद मैदान मार लेता है। मुंशीजी लिखते हैं—"उसके पास न्याय का बल और नीति की शक्ति है।" 

इसे पढ़ते ही मुझे ‘नमक का दरोगा’ के वंशीधर याद आते हैं। न्याय बताता है कि किसे जीतना चाहिए और नीति बताती है कि जीतेगा कौन। शायद इसीलिए जब तक वंशीधर केवल न्याय को लेकर लड़ते रहे, अलोपीदीन मैदान मारते रहे। लेकिन हामिद लोगों को यह बिल्कुल नहीं बताता कि उसने चिमटा क्यों खरीदा है। वो यह बात समझता है— 


"रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय। 

सुनि अठिलैंहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥" 


उसके पास उसे जिताने के लिए तर्क यानी नीति है। 


घर पहुँचते ही सभी के खिलौने अपनी-अपनी नियति से टकराते हैं। सब टूटते हैं, सिर्फ़ लोहे की चीज़ बची रहती है।अमीना हामिद को खाली पेट चिमटे के साथ देखकर छाती पीट लेती है, गुस्सा होती है, फिर खूब रोती है और ढेरों दुआएँ देती है। 


मुंशी जी ने आगे लिखा है— 


"अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई।....." 


मुझे हामिद का बूढ़ापन तो अब तक समझ आ गया। यह वही भूमिका है, जब हम दूसरे के दुःख को अपने सुख से पहले रख पाते हैं। लेकिन अमीना का बच्ची हो जाना? दामन फैलाकर बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदें गिराना? इसका क्या मतलब है? 


शायद अमीना चिमटे को देखकर खुश है। 

नहीं, वह ज़रूर हामिद के त्याग को देखकर भावुक है। 

या बात इससे भी बढ़कर है। 


मुझे लगता है, वह रो रही है क्योंकि उसने पहली बार अपने प्रेम की प्रतिध्वनि सुनी है। उसे दिखा है कि जिसे मैंने इतना प्रेम दिया, उसके भीतर मेरा प्रेम व्यर्थ नहीं गया। वह भी मुझसे प्रेम करता है। 


अगर आपने भी ओ. हेनरी की ‘The Gift of the Magi’ पढ़ी है, तो मुझे नहीं लगता कि मेरी यह बात सुनकर आपको उसका ध्यान नहीं आया होगा। जिम और डेला अपनी सबसे प्रिय वस्तु बेचकर एक-दूसरे के लिए उपहार खरीदते हैं। अंत में दोनों उपहार कथित रूप से बेकार हो जाते हैं, लेकिन दोनों रो पड़ते हैं। 

उपहार के कारण नहीं। 

शायद यह सोचकर कि—"तुमने मेरे लिए इतना सोचा?" 

मुझे अमीना के आँसू जिम और डेला के आँसुओं के बहुत क़रीब दिखाई देते हैं। 

 

सच कहूँ तो, मेरे पास कुछ प्रश्न पहले से थे। ईदगाह की तरफ़ मैं उन्हीं को लेकर वापस लौटा था। 

आज मैं और आप चिमटे वाले दृश्य पर रो पड़ते हैं, लेकिन यदि वही हामिद बीस साल बाद भी हर बार चिमटा खरीद रहा हो, हर बार अपनी इच्छा छोड़ रहा हो, हर बार दूसरों की ज़रूरत को अपने ऊपर रख रहा हो, तो क्या हम फिरभी उतने ही खुश होंगे? 

क्या हामिद खुश होगा? 


और अगर इन बीस वर्षों में हामिद त्याग का आदी होता जाए? यदि उसे ऐसी परिस्थितियाँ अच्छी लगने लगें जहाँ वह अपने हिस्से की खुशी छोड़ सके? यदि उसे वही संबंध प्रिय लगने लगें जहाँ देना अधिक और लेना कम पड़े? 

तब ? 

और फिर जब परिस्थितियाँ ऐसी हों कि त्याग करने की आवश्यकता ही न बचे, तो उसे मानो बेचैनी होने लगे! 

और फिर वह स्वयं ऐसे दुःख ढूँढ़ने लगे जहाँ वह 'प्रेम देने वाले- त्याग करने वाले ' की भूमिका फिर से पा सके? 

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HARE KRISHNA DIXIT
HARE KRISHNA DIXIT
Jun 17

विचारों को बहुत सुन्दरता से समझाया गया है।

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