प्रेम पुजारी मन ये मेरा
- Mayank Kumar

- Jul 31, 2023
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प्रीत का चँदा रोज़ रात को,
ठंडी आँहे भरता है l
प्रेम पुजारी मन ये मेरा,
तेरी बाते करता है ll
मनोहर नयन उसके ऐसे की,
जैसे तम में चाँदानी l
तूल्यकालन ताल में जैसे,
हो नयी एक रागिनी ll
वन में वन्यकुसुम जैसी,
कोमल उसकी पलके हैं l
दिनकर का प्रतिबिम्ब हो जल में,
ऐसी पावन झलके है ll
भूरे मटमैल नयन उसके ये,
हाय रे आफ़त हो जाएँ l
बिन मंदिर गिरजाघर जाए,
ही इबादत हो जाए ll
नैन ये पलको से ढक जाए,
तो धरती गुल आबाद करे l
खुल जाए तो ज्वार उठा दे,
धरा पे उन्माद करे ll
नैनो का ये इंद्रजाल न,
छूट जाए डरता है l
प्रेम पुजारी मन ये मेरा,
तेरी बाते करता है ll
मुस्कान ये अरुणिम स्वर्णिम अद्भुत,
जल में आग लगा देगी l
दुर्भिक्ष धरा के वक्ष को चीर,
मंजर कुसुम खिला देगी ll
मुस्कान ये शांत अरण्य भाँति,
मन के पीर सुला देगी l
खिलखिला दे हृदय में टीस,
संतापी ज्वार जगा देगी ll
मन ये वीर - पीर का भोगी,
पालन तेरा करता है l
प्रेम पुजारी मन ये मेरा,
तेरी बाते करता है ll
ज़ुल्फ घनेरी शाम के भाँती,
गहराई में डूबी गागर है l
सब सुख - दुख से दूर वो मोती है,
जिसको घेरता सागर है ll
उस शीतल रचना भाँति,
जो बिन बोले बात करे l
खुल जाए तो सब स्याह बिखेर,
काली अनन्त रात करे ll
मैं भी उस रात का जोगी,
जिसका तारण भरता है l
प्रेम पुजारी मन ये मेरा,
तेरी बाते करता है ll
तेरा मेरा किस्सा अनोखा,
मञ्चन और अभिनय है l
अनुनय विनय से सदा लड़ता,
अपना ये प्रणय है ll
काल की गती जो सदा शील हो,
बीतते वर्ष की चाल को भाँति है l
तू रोज़ मेरी ज़िन्दगी बन जाती,
पर मुझे पेहचान न पाती है ll
तेरे रूप के दर्शक हज़ार,
प्रशंसक, प्रेमियों की छाया है l
मै लुप्त हो चुका काल हूँ,
जिसको छोड़ चुका उसका साया है ll
तुम सहस्त्र शमियानो की रानी,
दूलीप, संदीप, प्रदीप हो l
मै रोज़ हवाओं से जूझता,
जैसे जलता बुझता दीप हो ll
पर मै फिर भी तेरे रूप को गाऊँगा
रोज़, प्रतिदिन शब्द पिरोता जाऊँगा l
क्यों! आखिर क्यों? क्यूकी,
रानी ये सब सुधाएँ काल को भाँति नहीं है,
रूप की आभा सदा साथ निभाती नहीं हैं l
समय ऐसा भी आएगा,
जब तृष्णाये ढल जाएँगी l
तब शरीर को चलाने वाली,
ये हड्डियाँ भी गल जाएँगी ll
तब प्रशंसको की डोर,
पास न होगी l
इस जीवन को जीने की,
कोई खास आस न होगी ll
पर तब भी शब्द मेरे यह शास्वत रहेगे,
पावन तेरे इस रूप की कहानी हमेशा कहेगे l
पस्त पड़े सब भूभाग को समर कर देगे,
शब्द मेरे ये रूप तेरा अमर कर देगे l
तेरे से मिलना सिर्फ कल्पना है,
जिसमे रहना ही अच्छा है l
तू मिले न मिले, जहाँ रहे खुश रहे
बस यही मेरी इच्छा है ll
प्रीत के इस दर्द से,
हृदय मेरा रोज़ उभरता है l
प्रेम पुजारी मन ये मेरा,
तेरी बाते करता है ll
-मयंक कुमार







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