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प्रेम पुजारी मन ये मेरा


प्रीत का चँदा रोज़ रात को, 

ठंडी आँहे भरता है l

प्रेम पुजारी मन ये मेरा, 

तेरी बाते करता है ll


मनोहर नयन उसके ऐसे की,

जैसे तम में चाँदानी l

तूल्यकालन ताल में जैसे, 

हो नयी एक रागिनी ll

वन में वन्यकुसुम जैसी, 

कोमल उसकी पलके हैं l

दिनकर का प्रतिबिम्ब हो जल में, 

ऐसी पावन झलके है ll

भूरे मटमैल नयन उसके ये, 

हाय रे आफ़त हो जाएँ l

बिन मंदिर गिरजाघर जाए, 

ही इबादत हो जाए ll

नैन ये पलको से ढक जाए, 

तो धरती गुल आबाद करे l

खुल जाए तो ज्वार उठा दे, 

धरा पे उन्माद करे ll

नैनो का ये इंद्रजाल न,

छूट जाए डरता है l

प्रेम पुजारी मन ये मेरा, 

तेरी बाते करता है ll


मुस्कान ये अरुणिम स्वर्णिम अद्भुत, 

जल में आग लगा देगी l

दुर्भिक्ष धरा के वक्ष को चीर, 

मंजर कुसुम खिला देगी ll

मुस्कान ये शांत अरण्य भाँति, 

मन के पीर सुला देगी l

खिलखिला दे हृदय में टीस, 

संतापी ज्वार जगा देगी ll

मन ये वीर - पीर का भोगी, 

पालन तेरा करता है l

प्रेम पुजारी मन ये मेरा, 

तेरी बाते करता है ll


ज़ुल्फ घनेरी शाम के भाँती, 

गहराई में डूबी गागर है l

सब सुख - दुख से दूर वो मोती है, 

जिसको घेरता सागर है ll

उस शीतल रचना भाँति, 

जो बिन बोले बात करे l

खुल जाए तो सब स्याह बिखेर, 

काली अनन्त रात करे ll

मैं भी उस रात का जोगी, 

जिसका तारण भरता है l

प्रेम पुजारी मन ये मेरा, 

तेरी बाते करता है ll


तेरा मेरा किस्सा अनोखा, 

मञ्चन और अभिनय है l

अनुनय विनय से सदा लड़ता, 

अपना ये प्रणय है ll

काल की गती जो सदा शील हो, 

बीतते वर्ष की चाल को भाँति है l

तू रोज़ मेरी ज़िन्दगी बन जाती, 

पर मुझे पेहचान न पाती है ll

तेरे रूप के दर्शक हज़ार, 

प्रशंसक, प्रेमियों की छाया है l

मै लुप्त हो चुका काल हूँ, 

जिसको छोड़ चुका उसका साया है ll

तुम सहस्त्र शमियानो की रानी, 

दूलीप, संदीप, प्रदीप हो l

मै रोज़ हवाओं से जूझता, 

जैसे जलता बुझता दीप हो ll


पर मै फिर भी तेरे रूप को गाऊँगा

रोज़, प्रतिदिन शब्द पिरोता जाऊँगा l


क्यों! आखिर क्यों? क्यूकी, 


रानी ये सब सुधाएँ काल को भाँति नहीं है, 

रूप की आभा सदा साथ निभाती नहीं हैं l

समय ऐसा भी आएगा, 

जब तृष्णाये ढल जाएँगी l

 तब शरीर को चलाने वाली, 

ये हड्डियाँ भी गल जाएँगी ll

तब प्रशंसको की डोर, 

पास न होगी l

इस जीवन को जीने की, 

कोई खास आस न होगी ll

पर तब भी शब्द मेरे यह शास्वत रहेगे, 

पावन तेरे इस रूप की कहानी हमेशा कहेगे l

पस्त पड़े सब भूभाग को समर कर देगे, 

शब्द मेरे ये रूप तेरा अमर कर देगे l


तेरे से मिलना सिर्फ कल्पना है, 

जिसमे रहना ही अच्छा है l

तू मिले न मिले, जहाँ रहे खुश रहे 

बस यही मेरी इच्छा है ll

प्रीत के इस दर्द से, 

हृदय मेरा रोज़ उभरता है l

प्रेम पुजारी मन ये मेरा, 

तेरी बाते करता है ll

-मयंक कुमार


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