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सारा जग बहरा है

Jul 31, 2023
1 min read

जल रहा हृदय और

मस्तिष्क भी बेहाल है

गर्दन फंदों में कसी

अधूरे सब सवाल है


साँस आने से कतराती

मुंह पे तालों का सहरा

बातें मन में घुटती रहती

किसने डाला मन पे पहरा


मुस्कान चिपकी चहरों पर

विस्मय भीतर पलता है

जीवन सूर्य संताप जल में

हो गुरूब अब ढलता है


अरे जाने दो! छोड़ दो!

है मन चिल्लाता..

पर अवसाद बड़ा गहरा है

बातें मन की कोई न सुनता

सारा जग बहरा है

सारा जग बहरा है


-मयंक

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