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कश्मकश

Jan 20, 2024
1 min read

This is inspired by an article which I came across recently and suddenly it dawned upon me how innately we have started to glorify the hustle culture...

A short take on a similar note..


अपने दिल की एक दास्तान सुनाउँ?

इन रफ्तारी लोगो का मुकाबला करना तो चाहती हूँ , जिन्दगी की होड़ में भागना तो चाहती हूँ ...

लेकिन फिर लगता है मुकाबला करने के लिए मुझे दुनिया की खूबसूरती को देखे बिना ही भागना पड़ेगा जिससे मैं उनकी तरह बन सकू।

मेरे इरादों और इमानो के खिलाफ सा लगता है,

पता नही क्यों अंदर ही अंदर कोई खोया सा लगता है।


अक्सर जब गुजरती हू उन रास्तों से,

लम्हों की चादर जैसे सिमट सी आती है,

वो टेबल आज भी खाली है जहाँ हम यारों की अब सिर्फ यादें बाकी है।

जिंदगी के कश्मकश में कुछ यू उलझ सी गई हूँ,

अपने शौक़ और चाहतों को जैसे भूल सी गई हूँ।


भागदौड़ के इस ज़माने में मैं आगे तो निकल आई हू,

पर शायद अपने बचपना को वही पीछे छोड़ दी हू।

सफर के इस सफरनामा में ना जाने कितने मकाम है, मैं मंजिलो के पीछे भागती और रास्ते अनजान है।

जरा आहिस्ता चल ए जिंदगी, की जीने को तो अभी सौ आसमान है।


सुबह की धूप अब प्यारी नही लगती,

अब शाम ढलते ही बातें नही होती।

कुछ अल्फाज अब खामोश से हो गए है,

मैने कहना चाहा क्या, और वो समझ क्या बैठे है!


गुजरते हुए लम्हों को जरा ठहर के महसूस करना चाहती हूँ,

एक सांस में एक उम्र गुजारना चाहती हूँ,

वक्त के नगमों से क्या डरना ए जिंदगी,

चल आज फिर से पहली दफा मैं तुझे जीना चाहती हूँ।

 
 
 

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