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मल्लिका

प्रेमिकाओं में एक अधिकार की भावना होती है। वह है – प्रेमी की आँखों में देखकर यह पूछ पाना कि तुमने ऐसा क्यों किया या तुम्हारे विचार में यह तर्कसंगत क्यों है। मेरा यह विचार वर्तमान परिवेश में शायद कुछ ठीक न लगे। व्यवहार और समाज के अलावा कई रचनाकार भी प्रेम में अधिकार की उपस्थिति को ठीक नहीं मानते। परंतु मैं मानता हूँ या बेहतर कहूँ कि मानने लगा हूँ – मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' पढ़ने के बाद। सन् 1958 में रचित यह नाटक भारत का पहला आधुनिक नाटक माना जाता है। सन् 1959 में इसे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। फ़िल्में बनीं, उन्हें क्रिटिक्स ने खूब सराहा। ख़ैर…



मैं इन औपचारिकताओं में ज़्यादा उलझना नहीं चाहता हूँ। कई वर्षों पहले मैंने किताब पढ़ी थी और कुछ दिन पहले किसी रंगमंच पर खेला गया वह नाटक दुबारा देख लिया। तब से मन व्यथित है। मैंने अधिकार के परिप्रेक्ष्य में जो वाक्य शुरू में कहा था, उसने इस नाटक की नायिका पर बहुत गहरा प्रभाव डाला। मल्लिका – वह सहज स्वभाव की लड़की, जो निस्वार्थ प्रेम किया करती थी कालिदास से। उसने इतना लोकापवाद झेला, इतने व्यंग्य-बाण झेले, अपने आप को प्रेम में पूर्णतः झोंक दिया। किसके लिए? ताकि कालिदास को प्रतिष्ठा मिले, सम्मान मिले, उनका यश हो जिसके वे निश्चित अधिकारी थे। परंतु इस सब के बीच वह अपना स्वयं खो बैठी, अधिकार का एक अंश भी न जताया। कभी-कभी तो सोचता हूँ कि यदि प्रेम में इससे ज़्यादा किसी ने सहा है, तो धिक्कार है प्रेम के प्रेम होने पर। ख़ैर…


माफ़ कीजिएगा, मैं अपनी व्याकुलता में स्वयं को रोक न सका, उन नियमों के कहीं विपरीत चला गया, जो साहित्य में साँस भरते हैं – क्रम। एक छोटा-सा गाँव – उज्जयिनी में। उस गाँव में रहने वाली एक लड़की – मल्लिका और उसका प्रेमी कालिदास। आज आषाढ़ का पहला दिन है, मेघ-गर्जना हो रही है, अरे मेघ बरसने भी लगे। पर्वत-श्रृंखलाओं के बीच दो प्रेमी जीवन के सर्वोत्तम आनंद को महसूस कर रहे हैं शायद – उनके बदन भीगे हुए हैं, वे नज़दीक हैं, आज शायद आत्मा का मिलन हो रहा है, जो वर्षों की दूरी में भी प्रेम को क्षीण न होने देगा। बारिशें, यात्राएँ और शामें सामान्य परिघटनाएँ नहीं हैं, वे प्रेम-यज्ञ हैं, आत्मा के मिलन का अभिषेक है, उनमें क्षमता है – कालचक्र के प्रभाव से भी आत्मीयता को बचाए रखने की। आज शाम भी थी और बारिश भी।



मल्लिका घर लौटती है – माँ के सामने बड़े प्रेम से आज के उन मनमोहक दृश्यों का ज़िक्र करने लगती है। व्यंग्य-बाण पड़ते हैं, नाराज़गी रहती है, वही बहस, वही विवाह का ज़िक्र, वही लोकापवाद के परिप्रेक्ष्य में बातें। परंतु आज वह सब झेल लेगी, कुछ भी कह लो मुस्कुराती रहेगी। असहज लगता है कि दो क्षण प्रेम करने के बाद व्यक्ति प्रसन्नता से इतना ओत-प्रोत हो जाता है कि सारे जीवन के खालीपन में भी नहीं टूटता। प्रेम सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं देता आपको, वह विश्वास देता है और इससे भी ज़्यादा जो चीज़ देता है – वह आशा है। एक ऐसी आशा जो शाश्वत है और जो पवित्र है। ख़ैर…

जी चाहता है इसका ज़िक्र करता रहूँ, लेकिन यह बहुत छोटा कालखंड है नाटक का। गाँव में ख़बर फैलने लगी कि उज्जयिनी से कोई आचार्य आए हैं और वे यह ख़बर लाए हैं कि उज्जयिनी के सम्राट कालिदास का सम्मान करना चाहते हैं, उन्हें राजकवि बनाना चाहते हैं। सारे गाँव में बात फैल गई, परंतु कालिदास नहीं जाना चाहते। वे क्यों जाएँ – यहाँ पर्वत-श्रृंखलाएँ हैं, मेघ-मालाएँ हैं, हरिण-शावक हैं, पशु-पक्षी हैं, सारा रोमांच है। उनकी आत्मा है यहाँ, उनकी मल्लिका है यहाँ। क्यों जाएँ वो? नहीं जाएँगे। हठ है। नहीं चाहिए सम्मान। जब मल्लिका को यह पता चलता है, वह उन्हें मनाने पहुँचती है। जगदंबा के मंदिर में। कालिदास बैठे हुए हैं, उनके हाथ में हाथ रखकर मानो पुचकारते हुए, क्यों न जाओगे। वहाँ सम्मान मिलेगा, वह नई भूमि तुम्हें और भी संपन्न बना देगी। क्यों नहीं जाते?


कल्पना कीजिए – एक प्रेमिका जो आज अपने प्रेमी के साथ मेघ-मालाओं के बीच श्रृंगार-रस की पराकाष्ठा को छूकर आई है, अब तक प्रफुल्लित थी, और अपने प्रेमी के हाथ में हाथ रखकर उसे समझा रही है। उसकी संपन्नता के लिए, यश के लिए – विरह तक झेलने को तैयार है। कालिदास तो राजकवि बनेंगे, वह क्या करेगी, उन मेघ-मालाओं तक जाकर शरीर तो भीगेगा, हृदय पाषाण तो होगा, परंतु आत्मा न घुलेगी। यही तो है जो मेघदूत की यक्षिणी बनेगी, अभिज्ञानशाकुंतलम् की शकुंतला बनेगी और कुमारसंभव की उमा बनेगी। कहीं वे रंगशालाएँ, वे राजकन्याएँ उनका मन न मोह लें, कहीं राजनीति और मदिरालय में व्याप्त न हो जाए कालिदास, ऐसा कोई विचार, कोई शंका मल्लिका के मन में न हुई। कितना विश्वास होता होगा प्रेम में, कल्पना कीजिए। ख़ैर…



कालिदास चले जाते हैं, उज्जयिनी। वहाँ की राजनीति में व्यस्त हो जाते हैं। वे तो नहीं लौटते जल्दी, परंतु कई ख़बरें मिलती हैं। व्यवसायियों से। उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है उज्जयिनी में, बड़ा सम्मान मिला। उन्होंने मेघदूत लिखा, अभिज्ञानशाकुंतलम् लिखा, कुमारसंभव लिखा। एक-दो प्रतियों के लिए व्यवसायियों से मल्लिका विनती किया करती थी। उसी बीच एक और ख़बर आई – कालिदास ने सम्राट की पुत्री प्रियंगुमंजरी से विवाह कर लिया है, उनका नाम 'मातृगुप्त' हो गया है और वे कश्मीर जा रहे हैं वहाँ का शासन संभालने। किसी प्रेमिका को यह ख़बर मिले तो वह क्या करेगी, नाराज़ होगी, या असहाय होगी तो परेशान हो उठेगी, हृदय व्याकुल हो जाएगा, आँखें भर आएँगी। मल्लिका की प्रतिक्रिया –


"उनके प्रसंग में मेरी बात कहीं नहीं आती। मैं अनेकानेक साधारण व्यक्तियों में से हूँ। वे असाधारण हैं। उन्हें जीवन में असाधारण का ही साथ चाहिए था।... सुना है राज-दुहिता बहुत विदुषी हैं।"


वह कालिदास जिन्होंने गाँव में इस आधार पर विवाह न किया था, कि यह उनकी कोई प्रतिज्ञा है कि वे विवाह न करेंगे। आज विवाह कर चुके थे एक राजकुमारी से। उनकी प्रेमिका इतना सामान्य-सा, इतना सुलझा हुआ, इतना निस्वार्थ उत्तर देती है। कैसे दे सकती है? वह नाराज़ क्यों नहीं होती? यह कौन-सा अनुराग, कौन-सी भक्ति है। प्रेम निष्ठा और समर्पण तो माँगता है न। हाँ, विरह झेलना ठीक है, भई प्रेम से सब कुछ नहीं होता, घर-परिवार चलाना है, अपने कौशल को दिखलाना है, सफल होना है। पर विवाह? तुम विवाह कैसे कर सकते हो, कालिदास। एक लड़की क्षण-क्षण तुम्हारी प्रतीक्षा में है, इतने बड़े त्याग के बाद भी क्या वह तुम्हारे प्रेम की अधिकारिणी न बन सकेगी। तुम कितने भी स्पष्टीकरण दे देना, तुम्हारी प्रेमिका में कितना भी विश्वास हो पर मैं नहीं मानता कि कोई भी राजनीति, कोई भी प्रपंच एक व्यक्ति को इतना असहाय बना सकता है कि वह अपनी प्रेमिका को छोड़कर किसी और से विवाह कर ले।


इसी बीच कालिदास और प्रियंगुमंजरी गाँव आ पहुँचे। वे उज्जयिनी से कश्मीर जा रहे थे। राजकुमारी की इच्छा थी कि वे उस परिवेश को देखें जिसने कालिदास जैसे महान व्यक्तित्व को निखारा है। सबसे ज़्यादा वे रोमांचित थीं – मल्लिका से मिलने के लिए। कौन है वह स्त्री, जो इतने धन-वैभव, भोग के इतने साधनों के बाद भी उसके पति के मानस-पटल में घर किए हुए है, कौन है जिसका ज़िक्र मेघदूत लिखते हुए कालिदास लगभग रोज़ किया करते थे। कौन है जो इतने बड़े साम्राज्य के कुशल देखभाल को प्रभावित कर दिया करती थी – कालिदास अक्सर अपने ग्रामीण परिवेश और मल्लिका के बारे में सोचते हुए ग़मगीन हो जाया करते थे। मल्लिका मन-ही-मन उत्साहित थी, उसके चेहरे के हाव-भाव में ज़्यादा परिवर्तन न था, परंतु वह भी मिलना चाहती थी अपने कालिदास से।



कालिदास मिलने नहीं आए। आई तो प्रियंगुमंजरी और वह भी इतने कटु वाक्य कहने। मल्लिका को विवाह का प्रस्ताव देने – अपने किसी राजदरबारी से। और उसे अपने साथ कश्मीर चलने के लिए कहने। मल्लिका ने धैर्यपूर्वक मना कर दिया, राजकुमारी के ऊपर ज़रा भी खीझी नहीं। राजकुमारी की कटुता, उसका अहंकार तो स्वाभाविक था। कोई भी स्त्री अपने पति की पूर्व प्रेमिका से हल्का द्वेष तो रखती ही है। राजवंश में जन्मे लोगों का ख़ून ज़रा गर्म तो होता ही है, फिर प्रियंगुमंजरी तो सम्राट की पुत्री थीं, उनमें अहंकार होना तो स्वाभाविक ही है न। इससे भी विकट दुख मल्लिका के मन में था, कालिदास मिलने नहीं आए। वे मिलने आते तो कितना अच्छा होता, जब से वे गए हैं, वह उनके ख़यालों में कोई रहती है। कभी मेघदूत की पंक्तियाँ पढ़ती है, कभी कोरे काग़ज़ों को एक-से-एक में सिलती है, जब कालिदास आएँगे न तो वो उन्हें देगी। कहेगी कि इन्हीं पन्नों पर वे अपना सर्वोत्तम महाकाव्य लिखें। कई बार तो पन्ने भीग जाते हैं, उसके अश्रुओं से। कुछ पन्ने तो ख़राब हो उठे हैं। फिर वे पर्वत-श्रृंखलाएँ, मेघ-मालाएँ और कितना कुछ। ख़ैर…


कालिदास नहीं आए। वह जाकर पूछ क्यों नहीं लेती। उसके पास अधिकार तो है। वह उनकी प्रेमिका रही है न। बेशक उसने इस रिश्ते को कोई नाम न दिया पर अधिकार तो है ही। परंतु अब उसके हृदय में एक आत्मसम्मान का सृजन हो गया है। वह क्यों जाए? नहीं जाएगी। आना है तो कालिदास द्वार पर आएँ। उसकी माँ कहने लगी कि मैं जानती थी वो आत्मकेंद्रित व्यक्ति है, वह नहीं आएगा। उसने ही तुम्हें लज्जित करने के लिए, अपनी प्रतिष्ठा बताने के लिए राजकुमारी को भेजा है। मल्लिका वही वाक्य दोहराती है – 'उन्हें कुछ मत कहो माँ'। अब भी उसके मन में एक विश्वास है कि वे न आए तो कोई कारण रहा होगा। मल्लिका व्यथित थी पर उन्हें दोषी नहीं मानती। वह क्यों नहीं जाकर उनकी आँखों में आँखें डालकर पूछ लेती – तुमने क्यों विवाह किया राजकुमारी से, मिलने क्यों नहीं आए। पर वह न पूछ सकी, शायद विश्वास होगा प्रेम पर या शायद आदर्श प्रेमिका बनना चाहती हो। हो सकता है कि मातृगुप्त अब राजा बन गए हैं, यह जो एक अंतर हो गया है, वह उसे उनके पास जाने से रोक रहा हो। वह इसे आत्मसम्मान की खाल में छिपा रही है, शायद।


कालिदास चले गए। समय का कालचक्र घूमता जा रहा था। उसकी माँ का भी निधन हो गया था। मल्लिका भी अब कमज़ोर-सी होने लगी थी। घर की दशा बिगड़ गई थी। प्रेमी भी क्षीण होते हैं। वे सदा जवान नहीं रहते। गाँव में फिर एक नई ख़बर उड़ने लगी थी – कालिदास ने कश्मीर का राजपाठ छोड़ दिया है और संन्यासी हो गए हैं। यह ख़बर सुनकर वह टूट-सी गई, उनके महाकाव्यों की प्रतियाँ सामने जैसे विलाप कर रही हों। इतना तो वह तब भी नहीं टूटी थी, जब उसे पता चला था कि कालिदास ने विवाह कर लिया है। मल्लिका के जीवन का एक बड़ा गहरा प्रतिबिंब झलकता है यहाँ, एक ऐसा प्रतिबिंब जो प्रेम को इतना निस्वार्थ, इतना पवित्र बना देता है कि कोई भक्ति, कोई अध्यात्म इससे कहीं नीचे है। अब तक जो कुछ भी हो रहा था वह उसके हित में हो न हो, परंतु कालिदास के हित में था। उज्जयिनी जाना, विवाह करना, कश्मीर का शासक बनना। परंतु वह व्यक्ति जो श्रृंगार-रस की इतनी ख़ूबसूरत विवेचनाएँ लिख सकता हो, वह संन्यासी हो जाएगा। उसने न सोचा था। कालिदास उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन चुका था, एक ऐसा उद्देश्य जो उससे भले ही अब न जुड़ा हो, परंतु आज भी उतना ही आवश्यक था। आज वह उद्देश्य खंडित-सा हो गया था।



सहसा एक दिन उसके द्वार पर उसी उद्देश्य की ज्योति फिर से जगमगा उठी। कालिदास मल्लिका के द्वार पर खड़े थे। थके हुए, असहाय और ग्लानि से परिपूर्ण। विस्मय से मल्लिका उन्हें निहारती रही। उसे विश्वास न हो रहा था। पर्वत-श्रृंखलाएँ, मेघ-मालाएँ, उस घायल हरिण-शावक को अपने हृदय में लिए हुए कालिदास और एक गर्म दूध के पतीले को उसके मुख के पास लगाए वो, वह ग़मगीन शाम जब कालिदास को समझा-बुझाकर उसने राजधानी भेजा था, उनका आना और न मिलना, इतनी पीड़ा, इतना विरह और आज ये दिन। वे प्रतियाँ अभी भी रखी हुई हैं, वह कोरे काग़ज़ों वाली पोथी के काग़ज़ टूटने लगे हैं, उन्हें कैसे देगी वह? क्या बतलाएगी उनसे? क्या-क्या कहेगी? कालिदास उसके प्रकोष्ठ में प्रवेश करते हैं और एक ज़रा कम ऊँचे आसन पर बैठ जाते हैं।

बतलाने लगते हैं कि वे उन सब चीज़ों में लिप्त तो हो गए थे परंतु उनका मन वहाँ कभी न लगा। उनके सारे महाकाव्य उनके इस जीवन का संचय हैं। उन्होंने जो भी लिखा वो यहाँ से जुड़ा हुआ था, इसमें उज्जयिनी या राजसी जीवन का कोई प्रभाव न था। उनके हर महाकाव्य की नायिका मल्लिका ही थी, जो सब कुछ खो गया था, आज वे उसे पुनः प्राप्त कर लेना चाहते थे। आज एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ जीवन अथ से आरंभ करना चाहता है। परंतु अथ से कुछ आरंभ नहीं हो सकता। समय का कालचक्र किसी के लिए नहीं रुकता, किसी के लिए भी नहीं है। मुमकिन है प्रेम इससे बच जाए, पर प्रेमी इससे नहीं बच सकता। समाज और व्यावहारिकता हर व्यक्ति पर हावी हो जाती है – समय के साथ। आप किसी के साथ हों तो मुमकिन है इससे बच जाएँ, अकेले हों, टूटे हुए हों, तो हरगिज़ नहीं बच सकते।


मल्लिका जीवन में आगे बढ़ गई थी। उसका एक बच्चा था। वह चाहकर भी अथ से आरंभ नहीं कर सकती थी। एक प्रफुल्लित प्रेमिका जो इतनी मादकता से प्रेम में लिप्त हो गई थी, जिसने मेघों से सीखा था भावना का प्रवाह और कविता का सृजन, जिसने महसूस किया था दो जवाँ दिलों के कंपन को, आज किसी और के बच्चे की माँ थी। कुछ आख़िरी पल याद आते हैं –


मल्लिका – तुम कह रहे थे कि तुम फिर अथ से आरंभ करना चाहते हो।


कालिदास – मैंने कहा था कि मैं अथ से आरंभ करना चाहता हूँ। यह संभवतः इच्छा का समय के साथ द्वंद्व था। परंतु देख रहा हूँ कि समय अधिक शक्तिशाली है क्योंकि वह प्रतीक्षा नहीं करता।


अंदर से बच्चे के रोने की आवाज़ आती है। उसे देखने वह झट से अंदर दौड़ती है। इतने में कालिदास चले जाते हैं। वह आकर उन्हें आवाज़ देती है, बाहर जाने को देहरी से पैर बाहर निकालने का प्रयत्न करती है, परंतु ठहर जाती है। उसे ज़िम्मेदारियों का अनुबोध हो चुका है। समाज और व्यावहारिकता फिर एक बार प्रेम पर हावी हो चुके थे। शायद, अधिकार जताना चाहिए प्रेमिकाओं को और प्रेमियों को भी। कम-से-कम ज़ाहिर कर देना चाहिए। अथ से कुछ भी आरंभ नहीं हो सकता।

 
 
 

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