top of page
  • LinkedIn
  • Facebook
  • Instagram

किरदार - मानव और मानवीकरण



दुनिया का सबसे बड़ा फरेब यह है कि हमें लगता है हम सब एक ही दुनिया में जी रहे हैं; जबकि असल में, यहाँ हर इंसान अपने भीतर एक पूरी की पूरी दुनिया लेकर चल रहा है।


मानव

आप अपनी ज़िंदगी के मंच पर खड़े हैं और आपके नज़रिए से यह पूरी दुनिया आपके इर्द-गिर्द घूम रही है। आपके जीवन में आने वाला हर इंसान, हर रिश्ता, हर नाता आपके इस मंच का एक किरदार है। आप उन्हें उसी रूप में देखते हैं, जो भूमिका वो आपकी कहानी में निभा रहे हैं। सड़क पार करते हुए जिस अजनबी से आपका हल्का सा कंधा टकरा गया, हो सकता है आपके मंच पर वो महज़ एक 'लापरवाह राहगीर' का किरदार हो। या फिर, किसी अंजान शहर में कोई अजनबी आपकी छोटी सी भी सहायता कर दे, या सही रास्ता ही बता दे तो वह आपके लिए कोई महापुरुष से कम न होता है।



हर इंसान चलते-फिरते एक बंद डायरी की तरह है। हम उस डायरी के सिर्फ वही पन्ने पढ़ पाते हैं, जो वो हमारे सामने खुद खोलता है। लेकिन असली कहानी तो हमेशा उन पन्नों में होती है, जिन्हें वो दुनिया की नज़र से बचाकर, डर से या शायद किसी लिहाज़ से, मोड़ कर रख देता है।


मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने क्या खूब लिखा है - "हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिस को भी देखना हो, कई बार देखना।"


लेकिन हमारे पास इतना वक़्त कहाँ है कि हम किसी के भीतर के उन दस-बीस आदमियों को ठहर कर देखें? हम तो बस अपनी सहूलियत का एक पन्ना पढ़ते हैं और पूरी किताब का अंदाज़ा लगा लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि हर इंसान की एक दूसरी ज़िंदगी भी होती है, एक दूसरा रंगमंच, एक दूसरा किरदार! हम दूसरों को सिर्फ अपनी कहानी की रोशनी में आंकते हैं, यह भूलकर कि जहाँ हमारी रोशनी खत्म होती है, वहाँ से उनके अपने रंगमंच का अँधेरा, उनकी अपनी जद्दोजहद और उनके अपने किरदार शुरू होते हैं।



अध्याय १- मानवीकरण - जब बेजान चीजें भी सांस लेने लगती हैं


जब हम 'किरदार' शब्द सुनते हैं, तो हमारी कल्पना अक्सर साँस लेते, बोलते और चलते-फिरते इंसानों तक सिमट कर रह जाती है। पर क्या ज़िंदगी का यह रंगमंच वाकई इतना छोटा है? ज़रा अपनी रफ़्तार धीमी कीजिए और अपने आस-पास की उस गहरी खामोशी को महसूस कीजिए। आपके कमरे के कोने में रखी वह मेज़ जिस पर आपकी कई अधूरी रातें गुज़री हैं, वह आईना जो आपकी आंखों में खुशी की चमक से लेकर आपकी सबसे बनावटी मुस्कान का इकलौता गवाह है, या आपकी खिड़की के बाहर खड़ा वह पुराना पेड़ जिसने आपके साथ न जाने कितने मौसम सहे हैं, क्या ये सब महज़ 'निर्जीव वस्तुएं' हैं? बिल्कुल नहीं।


सृष्टि के इस विशाल नाटक में ये सब भी आपके जीवन के मंच पर एक बेहद ज़रूरी भूमिका निभा रहे हैं। इस दुनिया में कोई भी चीज़ अकारण आपके आस-पास नहीं है; ये वो मूक किरदार हैं, जो आपके जीवन का सारा शोर, आपके अनकहे राज़ और आपकी वो बातें जो आप किसी इंसान से नहीं कह पाते, बिना किसी शिकायत के अपने भीतर जज़्ब कर लेते हैं।


जिसे दुनिया 'मानवीकरण' कहकर एक साहित्यिक परिभाषा में बांध देती है, वह असल में एक लेखक का अपने आस-पास की वस्तुओं के साथ जिया गया एक गहरा रिश्ता है। एक कवि जब अपनी तन्हाई में कागज़ पर कलम घिस रहा होता है, तब कमरे में जलती हुई मोमबत्ती सिर्फ रोशनी नहीं कर रही होती, वह उसके साथ पिघल रही होती है। यह बेजान चीजें दरअसल वो दोस्त हैं जो कभी पन्ने पलटकर आपकी खामियां नहीं गिनातीं, बस चुपचाप आपके वजूद का हिस्सा बन जाती हैं।


मानवीकरण आखिर क्या है ?

'मानवीकरण' (Personification) कोई जटिल साहित्यिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि एक बेहद कोमल अहसास है। यह एक ऐसी कला है जहाँ लेखक किसी बेजान वस्तु, प्रकृति के किसी तत्व या किसी अमूर्त भावना के सीने में इंसानी दिल रख देता है। वह उसे हमारी तरह हंसना, रोना, थकना और तड़पना सिखा देता है।


हिंदी साहित्य का इतिहास गवाह है कि यह सिलसिला आज का नहीं है। छायावाद के दौर में जब सुमित्रानंदन पंत ने प्रकृति की लहरों और लताओं को सहेलियाँ बनाकर बात की, या महादेवी वर्मा ने जब दीपक को अपनी आत्मा का साथी मानकर जलने को कहा, तब से लेकर आज के दौर के विनोद कुमार शुक्ला, केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल और राजेश जोशी जैसे समकालीन कवियों तक, यह परंपरा लगातार समृद्ध हुई है। इन आधुनिक कवियों ने बादलों और पहाड़ों जैसे भव्य प्राकृतिक दृश्यों को छोड़कर घर के भीतर रखी मेज़, पैरों के जूते, दीवारों की दरारों और सड़कों पर दौड़ते ट्रकों को अपना हमराज़ बनाया है। वे जानते हैं कि इस मतलबी दुनिया में अगर कोई मुकम्मल वफ़ादारी से आपका साथ निभा सकता है, तो वो आपके कमरे का सन्नाटा और उसमें रखी बेजान चीजें ही हैं।


अध्याय २: विनोद कुमार शुक्ल और उनके घर का जादुई संसार

जब कभी मैं विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ पड़ता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे किसी आम घर में नहीं, बल्कि एक तिलिस्मी दुनिया में आ गया जहाँ हर वस्तु के पास अपनी एक आत्मा है। विनोद जी के यहाँ वस्तुएं महज़ इस्तेमाल की चीजें नहीं हैं, वे परिवार के सदस्यों की तरह सुख-दुख में हाथ बंटाती हैं।


कुछ पंक्तियाँ जो उन्होंने लिखी है इस प्रकार है -


"लिफ़ाफ़े के भीतर बंद चिट्ठी अंधेरे में अपना रास्ता ढूंढ रही थी, वह बेचैन थी बाहर आने के लिए क्योंकि उसे किसी की उदासी दूर करनी थी।"


यहाँ लिफ़ाफ़ा सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं है, वह एक बंद कमरा है और उसके भीतर बंद चिट्ठी एक जीता-जागता, तड़पता हुआ किरदार है। वह कोई बेजान लिखावट नहीं है; उसके पास एक दिल है और उसे पता है कि उसे कहाँ पहुँचना है। वह इसलिए बेचैन है क्योंकि उसे मालूम है कि दूर बैठा कोई इंसान उसका इंतज़ार कर रहा है और उसके बाहर आते ही किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी।


उनकी एक और बेहद जादुई कविता की कुछ पंक्तियाँ आपके समक्ष रखना चाहूँगा -

"कमरा छोटा था पर उसमें रहने वाले बड़े थे, जब वे लड़ते तो कमरा थोड़ा और छोटा हो जाता, और जब वे हंसते तो कमरा फैलकर बड़ा हो जाता जैसे वह भी उनके साथ खुशियाँ मना रहा हो।"


अध्याय २: गुलज़ार और अलमारी के शीशों में क़ैद 'किताबें'

गुलज़ार साहब की शायरी और कविताओं में एक अजीब सा मखमली दर्द होता है। वे যখন किसी बेजान चीज़ को छूते हैं, तो वह रो पड़ती है। आधुनिक दौर में जब इंसान तकनीक की चकाचौंध में अंधा होकर अपनी सबसे पुरानी और वफ़ादार साथी यानी किताबों को भूल गया, तब गुलज़ार ने किताबों के उस मूक दर्द को एक बेहद भावुक किरदार का रूप दिया।


उनकी इस बेहद लोकप्रिय कविता की ये पंक्तियाँ कुछ यूं है -

"किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं... महीनों अब मुलाकातें नहीं होती, जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी, अब अक्सर गुज़र जाती है कंप्यूटर के परदों पर।"


यहाँ मानवीकरण की पराकाष्ठा देखिए: किताबें महज़ धूल नहीं खा रही हैं, वे अकेलापन झेल रही हैं। वे इंसानी समाज की उस त्रासदी को बयां कर रही हैं जहाँ हमने गति और सुविधा को तो चुन लिया, लेकिन उस सुकून और धीमी आत्मीयता को खो दिया जो हमें कभी किताबों के पन्नों को पलटते हुए मिलती थी। अलमारी के बंद शीशे असल में हमारे आधुनिक इंसानी दिल के बंद दरवाज़े हैं।


अध्याय ३:

एक बेहद अनूठी कविता है जो जब मैने पढ़ी थी मुझे बहुत भायी थी, कविता का नाम तो मुझे याद नहीं मगर वो पंक्तियां मेरे ज़हन में बैठ गई है, वे कुछ इस प्रकार है -


"दीवार ने कसकर पकड़ रखा था आईने को, जैसे वह डरती हो कि अगर आईना छूटा, तो वह खुद को कभी देख नहीं पाएगी... क्योंकि दीवार के पास अपना कोई चेहरा नहीं होता।"


दीवार, जो हमे इतनी मज़बूत प्रतीत होती है, भीतर से इस बात को लेकर डरी हुई है कि उसका अपना कोई चेहरा नहीं है। वह आईने को एक वफ़ादार साथी की तरह अपनी छाती से चिपकाए रखती है ताकि आईने के ज़रिए उसका वजूद बना रहे।


यह मानवीकरण इंसानी रिश्तों के एक बहुत बड़े सच को उजागर करता है। कई बार जो इंसान बाहर से बहुत मज़बूत दिखाई देता है, वह भीतर से उतना ही खाली होता है। उसे अपने अस्तित्व को महसूस करने के लिए किसी संवेदनशील साथी के सहारे की ज़रूरत होती है। आप देख सकते है कैसे यहाँ बेजान चीज़ें यहाँ इंसानी मनोविज्ञान और असुरक्षा का एक खूबसूरत रूपक बन जाती हैं।


अध्याय ४: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की नज़र जब किसी बेजान चीज़ पर पड़ती है, तो वे उसका ऐसा मानवीकरण करते हैं कि वह वस्तु किसी फ़िल्म के मुख्य नायक की तरह हमारे सामने अपनी छाती तानकर खड़ी हो जाती है।


वे लिखते है - "वह फटा हुआ जूता रास्ते में पड़ा था, उसका खुला हुआ मुंह कह रहा था कि उसने कितनी मीलों का सफ़र पत्थरों से टकराकर तय किया है... वह रोया नहीं, बस थका हुआ था।"


वह जूता रोता नहीं है, क्योंकि उसे अपनी मेहनत पर गर्व है। वह फटने के बाद भी हार नहीं मानता, उसका खुला हुआ मुंह समाज की बेरुखी पर एक तीखा तंज है।


कुछ और पंक्तियाँ है -

"हवा आई और मेरी खुली किताब के पन्ने

सरसराकर पलटने लगी,

जैसे वह भी मुझसे पहले

कहानी का अंत जान लेना चाहती हो।"


यह मानवीकरण हमारे अकेलेपन को बहुत ही प्यारे तरीके से दूर करता है। यह पढ़कर मुझे महसूस हुआ कि जब आप बिल्कुल अकेले बैठकर कोई किताब पढ़ रहे होते हैं या सोच रहे होते हैं, तब प्रकृति भी एक दोस्त की तरह चुपके से आकर आपके कामों में तांक-झांक करने लगती है।


अध्याय ५- प्रेरणा की छांव में: एक कोशिश मेरी भी

विनोद कुमार शुक्ला, केदारनाथ सिंह या रघुवीर सहाय जैसे महान कवियों को पढ़ना महज़ साहित्य से गुज़रना नहीं है। यह अपने भीतर की संवेदनशीलता को दोबारा जगाने जैसा है। जब आप इन रचनाकारों की दुनिया को इतनी गहराई से महसूस करते हैं, तो आपके देखने का नज़रिया हमेशा के लिए बदल जाता है। आप वस्तुओं में छिपे उस मूक संसार को अनदेखा नहीं कर पाते जो हर पल आपके साथ जी रहा होता है।


सच कहूँ तो, इन दिग्गजों की रचनाओं ने मेरे अंदर के छोटे-मोटे लेखक को बहुत गहराई से प्रभावित किया है। बेजान चीज़ों में इंसानी जज़्बात ढूंढने की उनकी इस अद्भुत कला ने मुझे अंदर तक झकझोरा, और इसी प्रेरणा की छांव में बैठकर मैंने भी अपने आस-पास की खामोशी को शब्दों में ढालने की एक छोटी सी कोशिश की है।


मेरी डायरी के पन्नों से निकली एक कविता कुछ यूँ है...


शीर्षक - मेरे कमरे की दीवारें


मेरे कमरे में चार दीवारें हैं,

चारों की गढ़न में कोई अंतर नहीं,

न ही अंतर है चारों के हालातों में,

न ही कोई अंतर है रूप, जाति, धर्म का,

वैसे भी दीवारों में कहाँ होता है ये सब?

पर आप देख के बता सकते हैं,

कि चारों का जीवन एक समान नहीं रहा है।


एक पे हल्की झुर्रियां हैं, या हो सकता है मेरा वहम हो?

लगता है जैसे सालों की बातें और यादें समाई हैं इसमें,

आख़िर दीवारों के भी तो कान होते हैं?

संभला हुआ सा लगता है,

पहले बनाया गया होगा इसे!

इसका रंग हल्का है,

थोड़ा काँपता है, पिताजी कहते है उनके बचपन से है!

पानी के दाग हैं इसपे कुछ, बारिश के ही होंगे क्या पता ?


दूसरे पे टंगी है एक घड़ी, निरंतर चलती हुई,

मानो घड़ी की सूई के साथ इस दीवार का भी वक़्त निकला जा रहा हो

कुछ पाने, कुछ करने की आस में बैठा हुआ,

पिछले वाले से ज़रा सा साफ, ज़रा ज़्यादा मजबूत,

धूप की ओर खुलता है इसका दूसरा भाग,

दरवाजे और खिड़की है इसपे !

गंभीर है, मानो दुनिया देखता है इन्हीं खिड़कियों से,

पानी के दाग है इसपे भी, पसीना होगा शायद क्या पता ?


तीसरी दीवार पे है मेरे परिवार की तस्वीर,

और साथ टंगे मेरे कुछ पुराने मेडल,

ये दीवार कोई स्त्री सी लगती है!

अपने, सपने, अपने सपने सब दिखाई देते हैं इसमें!

सारे फर्नीचर टीके है इस दीवार से, बोझ ज़्यादा नज़र आता है,

दीवार पर नाराज़गी के भी अंश हैं हमारी भी दीवार कि भी,

एक कील है पुरानी जिसपे अब कुछ नहीं है,

कुछ पानी के दाग इसपे भी है, शायद आंसू होंगे, क्या पता?


चौथी दीवार खाली है, अकेला प्रतीत होता है

अरे पर तीन और दीवारें हैं तो सही कमरे में?

मेरी किताबें टिकी है इसपे, कविता लिखते हुए भी देखता होगा मुझे, कविता में आज अपने बारे में पढ़के खुश तो हुआ होगा?

हर्फनमौला सा है, कही-कही रंग लगा है,

लाल, हरा, नीला, न जाने क्या क्या!

बचपन की याद दिलाता है!

अरे हाँ!

कुछ पानी के दाग़ इसपे भी है,

मेरे पेंटिंग करते वक्त लगे होंगे, क्या पता ?


कमरे में मेरे ये चार दीवारें हैं।

-अनुभव


उपसंहारः जब चीजें बोलना शुरू करती हैं


यह मेरी एक छोटी सी कोशिश थी उन मूक किरदारों को जुबां देने की, जो हमारे घरों के कोनों में चुपचाप अपनी ज़िंदगी बसर करते हैं। उम्मीद है, इन महान कवियों के इस अद्भुत संसार और मेरी इस अदना सी कोशिश ने आपको निराश नहीं किया होगा और शायद आपके भीतर भी अपने आस-पास की बेजान चीज़ों के लिए एक नया नज़रिया जगाया होगा।


साहित्य का यह मानवीकरण हमें असल में और ज़्यादा इंसानी और संवेदनशील बनाना सिखाता है। यह हमें याद दिलाता है कि इस भागदौड़ भरी, मशीनी दुनिया में जहाँ इंसान धीरे-धीरे रोबोट बनता जा रहा है, वहाँ हमारी ये बेजान चीजें हमारे भीतर की आत्मीयता को ज़िंदा रखे हुए हैं। वे चुपचाप खड़ी रहती हैं, हमारा बोझ सहती हैं, हमारे अकेलेपन को बांटती हैं और बिना किसी शर्त के हमसे वफ़ादारी निभाती हैं।


तो, अगली बार जब आप अपने कमरे में अकेले बैठें, तो एक बार ठहरकर अपने आस-पास ज़रूर देखिएगा। वह खूंटी पर टंगी पुरानी कमीज़, वह अलमारी में बंद किताबें, या खिड़की से झांकती हुई धूप, ये सब महज़ 'चीज़ें' नहीं हैं। ये आपके जीवन के इस लंबे नाटक के वो मूक सह-कलाकार हैं, जो आपके बिना कुछ कहे भी आपकी हर एक भावना को समझते हैं।


मेरे यह कुछ खयाल पढ़ने के लिए बोहोत बोहोत धन्यवाद!

Comments


CATEGORIES

Posts Archive

Tags

HAVE YOU MISSED ANYTHING LATELY?
LET US KNOW

Thanks for submitting!

 © BLACK AND WHITE IS WHAT YOU SEE

bottom of page