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यात्रा वृत्तांत : एक समीक्षा

‘यात्रा वृत्तांत’ एक शब्द के तौर पर कठोर मालूम पड़ता है। इसके कुछ सहज पर्याय है-यात्रा संस्मरण, सफरनामा इत्यादि। क्या है ये और क्यों लिखे जाते हैं? जब तमाम कैमरे अलग-अलग नजरिए से तस्वीरें ले रहे हैं, जब आपके एक क्लिक पर किसी भी पर्यटन-स्थल के बारे में जानकारियां मिल सकती हैं, ऐसे में यात्रा वृत्तांतों का आज के परिवेश में क्या लाभ है और ये क्यों लिखे जाएँ। यह प्रश्न कठोर तो है लेकिन उससे ज्यादा असहज है। ‘पारंपरिक’ शब्द का चयन ठीक नहीं लगता, इसलिए मैं इसे ‘रेट्रो’ विचार से जोड़कर देखता हूं।


इस प्रश्न को समझने के लिए ‘साहित्य’ की परिभाषा को समझने की जरूरत है। मैं क्या देखता हूं, क्या समझता हूं, और क्या महसूस करता हूं, इसके अनुपात अलग हो सकते हैं और होने भी चाहिए। हालांकि इन तीनों की समकालिक उपस्थिति से साहित्य का उदय होता है। यह परिभाषा मौजूदा परिवेश में यात्रा वृत्तांत की आवश्यकता समझाती है। देखने के लिए कैमरे हो सकते हैं, समझने के लिए बहुत सी जानकारियां विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद हो सकती है, लेकिन उस परिवेश को, उन स्थितियों को महसूस करना मुश्किल है। सफर समझने के लिए सिर्फ मंजिल की चकाचौंध को नहीं देखना होता। सफर बनता है किसी छोटी-सी दुकान पर बैठकर एक पूरी संस्कृति के प्रति अपने दृष्टिकोण में जरा सा बदलाव लाने से या दुर्गम स्थानों पर जा रहे रास्तों को मरणासन्न स्थिति में होकर भी निगाह भर देखने से।

स्थितियां कुछ भी हो, उन्हें समझने और महसूस करने का जो तरीका यात्रा वृत्तांतों में होता है, वह यात्रा के कई पक्षों को उजागर करता है। एक लेखक लोगों से मिलता है और उनकी स्थितियों के परिपेक्ष में पूछता है। कौन से कार्य उनके लिए कितने सुगम या दुर्गम है, फिर स्वयं उन तमाम चीजों को महसूस करता है। अपने अनुभवों पर भावनात्मक दृष्टिकोण से विचार करता है, इसके पश्चात एक ‘यात्रा वृत्तांत’ का सृजन करता है। आप कैमरे के लेंस को लाख बेहतर करते जाइए लेकिन वह किसी यात्रा के भावनात्मक पक्ष को कभी दर्ज नहीं कर सकता।

राहुल सांकृत्यायन की रचना ‘तिब्बत में सन्यासी’ में वे एक सन्यासी के संदर्भ में लिखते हैं-

बर्फीली हवाएं उसके वस्त्रों को छूती है,

पर मन उसका निर्विकार रहता है।

शरीर ठंड से कांप सकता है,

पर आत्मा शून्य में लय हो चुकी है।

‘बर्फीली हवाएं’ और ‘शरीर का ठंड से कांपना’ वहाँ की जलवायु परिस्थितियां समझाता है। वही ‘निर्विकार मन’ और ‘शून्य में लय आत्मा’ वहाँ के सन्यासियों के मन में जो अडिगता है और ईश्वर के प्रति जो विश्वास है, उसे उजागर करता है। ‘यात्रा वृत्तांत’ अक्सर भौगोलिक व दार्शनिक पक्ष को साथ-साथ प्रस्तुत करते हैं, और क्योंकि वे लेखको द्वारा रचित होते हैं, उनमें मार्मिक पक्ष भी मौजूद होता है। यात्रा सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं की जाती, हम उम्मीद करते हैं कि वे हमारे विचारों को समावेशी बनाएंगी, ऐसे में यात्रा वृत्तांत कारगर साबित हो सकते हैं।

इसके अतिरिक्त इतिहासकार मानते हैं कि यात्रा संस्मरण किसी भी समाज को समझने के लिए श्रेष्ठतम रचनाएं हैं। यह अक्सर सामाजिक दबाव से मुक्त होते हैं और इसलिए इनमें सत्यता का स्तर ज्यादा होता है। इन्हें लिखने वाले लोग बाहरी होते हैं इसलिए इनमें एक समाज के पूर्वाग्रह से मुक्त लेखन होता है। उदाहरण के लिए एक समाज में जातिवाद का प्रचलन है और लोग उसके आदी हो चुके हैं। ऐसे में इसे एक समस्या के रूप में इंगित करना, उस समाज के लोगों के लिए मुश्किल होगा लेकिन एक बाहरी व्यक्ति इस समस्या को तुरंत समझ सकता है। भारतीय इतिहास को समझने के लिए कई बार इब्न बतूता और मार्को पोलो की यात्रा वृत्तांतों का उल्लेख किया जाता है। आज दौर वैश्वीकरण का है लेकिन यात्रा वृत्तांत लिखे जाने चाहिए, ताकि आगामी पीढ़ी एक समाज के तौर पर बेहतर होती जाए।

‘यात्रा वृत्तांत’ एक समाज को भौगोलिक, दार्शनिक और मार्मिक तौर पर समझने के लिए साहित्य का महत्त्वपूर्ण अंश है। इसके साथ-साथ इनके माध्यम से पूर्वाग्रह से मुक्त होकर समाज को देखा जा सकता है। आज दौर कैमरों का है जो देखने के स्तर को बेहतर करते जा रहे हैं, ‘ए.आई.’ समझने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है, ऐसे में ठहर कर सोचना और महसूस करना बहुत जरूरी है। मुझे लगता है कि किसी भी यात्रा के मूल तत्व को समझने के लिए यात्रा वृत्तांत लिखे जाने चाहिए।


 
 
 

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