महताब
- Mrityunjay Kashyap

- 16 hours ago
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ज़ाहिर ना सही ख़्वाब में आने के लिए आ,
आ एक झलक सी ही दिखाने के लिए आ।
रहज़न तू मुझे लूट ले जाने के लिए आ,
सारिक़ तू दिल-ओ-जान चुराने के लिए आ।
इस हुस्न का ए'जाज़ दिखाने के लिए आ,
काफ़िर को भी सज्दे में झुकाने के लिए आ।
पाने के लिए आ या लुटाने के लिए आ,
आ तो सही कोई भी बहाने के लिए आ।
ख़ुद को खो चुका हूँ मैं ख़यालों में तुम्हारे,
इक बार मुझे मुझ से मिलाने के लिए आ।
इस राख-ए-जिगर में है बचा एक शरारा,
यह आतिश-ए-ख़ामोश जलाने के लिए आ।
बे-मेहर हवाओं में रही शम'अ भी लर्ज़ा,
मुझको तह-ए-दामन में छुपाने के लिए आ
माना कि तू ही वज्ह है इस दर्द की लेकिन,
सोज़िश की दवा दिल पे लगाने के लिए आ।
किस नाज़ से बैठा है खुले अर्श पे देखो,
महताब को इस रुख़ से चिढ़ाने के लिए आ।
तन्हा ही बहुत रातें गुजारी है तेरे बिन,
इक रोज़ शब-ए-हिज्र सजाने के लिए आ।
हक़ माँगता हूँ तुमसे यही जुर्म है मेरा,
'मुतरिब' को सर-ए-दार चढ़ाने के लिए आ।



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