गुलफ़ाम
- Mrityunjay Kashyap

- 1 day ago
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बरहम ज़बाँ से निकला दुश्नाम नहीं होता,
हर एक कहा शिकवा इल्ज़ाम नहीं होता।
था ताइर-ए-दिल दश्त-ए-उल्फ़त में यूँ सरगश्ता,
इन ज़ुल्फ़ से बेहतर कोई दाम नहीं होता।
तेरी ये निगाह-ए-हसरत कैफ़ भरी साक़ी!
बद बज़्म नहीं होती बद जाम नहीं होता।
वो अपनी अना-ओ-'इज़्ज़त भूल चुका है क्या,
मुश्ताक़ कभी मक़बूल-ए-'आम नहीं होता।
तकदीर मुहब्बत इतनी भी क्या तुझे मुझसे,
इस जिंदगी के ग़म से आराम नहीं होता।
पन्नों पे सियाही से अश'आर लिखे 'मुतरिब',
हर रंग-ए-सुख़न आखिर गुलफ़ाम नहीं होता।




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