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गुलफ़ाम

बरहम ज़बाँ से निकला दुश्नाम नहीं होता,

हर एक कहा शिकवा इल्ज़ाम नहीं होता।


था ताइर-ए-दिल दश्त-ए-उल्फ़त में यूँ सरगश्ता,

इन ज़ुल्फ़ से बेहतर कोई दाम नहीं होता।


तेरी ये निगाह-ए-हसरत कैफ़ भरी साक़ी!

बद बज़्म नहीं होती बद जाम नहीं होता।


वो अपनी अना-ओ-'इज़्ज़त भूल चुका है क्या,

मुश्ताक़ कभी मक़बूल-ए-'आम नहीं होता।


तकदीर मुहब्बत इतनी भी क्या तुझे मुझसे,

इस जिंदगी के ग़म से आराम नहीं होता।


पन्नों पे सियाही से अश'आर लिखे 'मुतरिब',

हर रंग-ए-सुख़न आखिर गुलफ़ाम नहीं होता।

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